श्राद्ध ही श्रद्धा है अमृतम पत्रिका ग्वालियर
पक्ष: पितरों को मानें या न मानें? एक बार अपने हृदय से पूछिए… कि हम आज जो हैं, उसमें हमारा कितना है? पितृ प्रतीक पाँच पार्थिव शिवलिंग हैं और हमारे पीछे खड़े उन अनगिनत पूर्वजों का कितना, जिनका चेहरा तक हमें याद नहीं? संसार में सभी पर तन का पितृऋण होता ही है और यदि धन का भी है, तो पितरों की आत्मा को शांति देने हेतु श्राद्ध कर्म जरूरी है। हमारे पितृ पूर्वज हमें पालने-पोसने, घर चलाने, सुख-सुविधा देने हेतु अनेक तरह के पाप कर्म, छल कपट करते हैं। पितरों का किया-धरा पुण्य पाप उन्हीं के साथ जाता है और वे मारते समय उम्मीद रखते हैं कि हमारे वंशज हमें जल देकर शांति की प्रार्थना करेंगे। जब हम पितृ शांति का कोई उपाय नहीं करते, तो वे कई जन्मों तक सर्प योनि भोगते हैं, इसी से कालसर्प दोष बनकर जातक को पीड़ित करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ गण वंश की वृद्धि करते हैं। पितृ मातृकाएँ धन बढ़ाती हैं और मातृमातृकाएँ हमें निरोग स्वस्थ रख घर में सुकून प्रदान कर लंबी आयु देती हैं। इसलिए १०० कम छोड़कर कनागत या कर्ण -आगत के दौरान पितरों के निमित्त ध्यान, पूजा-पाठ, दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए। सबसे पहले...