श्राद्ध ही श्रद्धा है अमृतम पत्रिका ग्वालियर
- पक्ष: पितरों को मानें या न मानें? एक बार अपने हृदय से पूछिए… कि हम आज जो हैं, उसमें हमारा कितना है?
और हमारे पीछे खड़े उन अनगिनत पूर्वजों का कितना, जिनका चेहरा तक हमें याद नहीं?
- संसार में सभी पर तन का पितृऋण होता ही है और यदि धन का भी है, तो पितरों की आत्मा को शांति देने हेतु श्राद्ध कर्म जरूरी है।
- हमारे पितृ पूर्वज हमें पालने-पोसने, घर चलाने, सुख-सुविधा देने हेतु अनेक तरह के पाप कर्म, छल कपट करते हैं। पितरों का किया-धरा पुण्य पाप उन्हीं के साथ जाता है और वे मारते समय उम्मीद रखते हैं कि हमारे वंशज हमें जल देकर शांति की प्रार्थना करेंगे।
- जब हम पितृ शांति का कोई उपाय नहीं करते, तो वे कई जन्मों तक सर्प योनि भोगते हैं, इसी से कालसर्प दोष बनकर जातक को पीड़ित करता है।
- गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ गण वंश की वृद्धि करते हैं। पितृ मातृकाएँ धन बढ़ाती हैं और मातृमातृकाएँ हमें निरोग स्वस्थ रख घर में सुकून प्रदान कर लंबी आयु देती हैं।
- इसलिए १०० कम छोड़कर कनागत या कर्ण -आगत के दौरान पितरों के निमित्त ध्यान, पूजा-पाठ, दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए।
सबसे पहले समझिए—पितृऋण क्या है?
- भारतीय संस्कृति ने मनुष्य को तीन बड़े ऋणों की याद दिलाई—देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण।
पितृऋण केवल धन का ऋण नहीं है।
हमारे माता-पिता ने हमें जन्म दिया,
पूर्वजों ने परिवार बचाया,
किसी ने खेत बनाया,
किसी ने घर बनाया,
किसी ने व्यापार खड़ा किया,
किसी ने कठिन समय में परिवार को संभाला।
हम उनके परिश्रम की अंतिम कड़ी हैं।
इसलिए श्राद्ध का मूल भाव है
- हे पितरों! जो कुछ आपने दिया, उसके लिए हम आपको विस्मृत नहीं हुए। यही स्मरण भारतीय संस्कार की आत्मा है।
श्रीमद् भगवत गीता भी पितृ-उपासना का उल्लेख करती है
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥
- अर्थात् देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को और पितरों की उपासना करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं।
- अर्थ यह नहीं कि विज्ञान की प्रयोगशाला में आत्मा को तौला जा सकता है; बल्कि यह श्लोक उस समय की भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि में पितृ-परंपरा के महत्व को स्पष्ट करता है।
महाभारत में श्राद्ध का अद्भुत वर्णन
- अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को श्राद्ध की महिमा बताते हैं। वहाँ श्राद्ध को पितरों के सम्मान में किया जाने वाला यज्ञ-सदृश कर्म कहा गया है और पितरों के प्रति श्रद्धा को परिवार तथा संतति के कल्याण से जोड़ा गया है। एक अन्य प्रसंग में कहा गया है कि
हृष्यन्ति पितरश्चास्य श्राद्धकाल उपस्थिते।
- अर्थात् श्राद्धकाल आने पर पितर प्रसन्न होते हैं—ऐसी धार्मिक मान्यता महाभारत में व्यक्त हुई है।
गरुड़ पुराण क्या कहता है?
- गरुड़ पुराण के पितृ-संबंधी अध्यायों में सपिण्डीकरण, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध की विस्तृत परंपरा मिलती है।
- वहाँ पितरों के प्रति श्रद्धा से इस लोक और परलोक में सुख मिलने की बात कही गई है। आगे पिता, पितामह और प्रपितामह को क्रमशः संतान, समृद्धि और अन्न-समृद्धि से जोड़ने वाला वर्णन भी मिलता है।
- इससे एक महत्वपूर्ण बात समझिए कि हमारे पूर्वजों को केवल मृत व्यक्ति मानकर भूल जाना भारतीय परंपरा नहीं है। उन्हें वंश की स्मृति और संस्कार की जीवित कड़ी माना गया है।
- आधुनिक विज्ञान ने भी माना है कि श्राद्ध न करने पर मृत आत्मा सर्पयोनि में जाती है और श्राद्ध न करने से कालसर्प दोष उत्पन्न होता है।श्राद्ध का सामाजिक या मनोवैज्ञानिक मूल्य अमान्य नहीं कर सकते।
- आज मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान की दृष्टि से भी पूर्वजों का स्मरण, परिवार की कहानी को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना, शोक को स्वीकार करना, दान करना और परिवार को एक साथ लाना अर्थपूर्ण परंपराएँ हो सकती हैं।
अर्थात्
- आत्मा के परलोक की बात आस्था का विषय है, लेकिन कृतज्ञता, स्मृति, परिवार और दान का मूल्य हमारे सामने प्रत्यक्ष है।
असली श्राद्ध क्या है?
- यदि पिता के जीवित रहते हमने उनसे बात नहीं की,
माँ के जीवित रहते उनके पास बैठने का समय नहीं निकाला, दादा-दादी की कहानियाँ सुनने में हमें शर्म आई और उनके जाने के बाद केवल एक दिन भोजन करा दिया, तो क्या हमारा कर्तव्य पूरा हो गया?
नहीं।
पितरों का सबसे बड़ा सम्मान है
उनके अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना।
- यदि पिता ईमानदार थे—ईमानदारी अपनाइए।
यदि माँ दानी थीं—दान कीजिए।
यदि दादा अतिथि-सत्कार करते थे—अतिथि का सम्मान कीजिए।
यदि पूर्वजों ने परिवार जोड़ा था—परिवार को तोड़ने से बचाइए। यही जीवित श्राद्ध है।
कनागत में क्या करें?
श्राद्ध पक्ष में अपनी परंपरा और कुलाचार के अनुसार—
- पितरों का स्मरण करें।
- तर्पण करें।
- श्राद्ध-विधि योग्य आचार्य से समझकर करें।
- अन्न, वस्त्र या आवश्यक वस्तुओं का दान करें।
- जरूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- गौ, पक्षियों और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा रखें।
- परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें।
- पितरों के नाम से कोई अच्छा कार्य करें।
- घर में कुछ समय शांत बैठकर अपने पूर्वजों को याद करें।
- महाभारत में भी पितरों के लिए जल-तर्पण और श्राद्ध की परंपरा का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
एक दिन अपने बच्चों से यह जरूर कहिए…
- बेटा, यह केवल पूजा नहीं है।
यह उन लोगों को याद करने का दिन है
जिनकी वजह से हमारा परिवार आज यहाँ तक पहुँचा। जिस बच्चे को अपने परदादा का नाम पता है,
वह अपनी जड़ों को पहचानता है।
और जिसकी जड़ें मजबूत हों,
उसे जीवन के तूफान आसानी से नहीं गिराते।
- इसलिए श्राद्ध को डर मत बनाइए—संस्कार बनाइए पितरों के नाम पर भय पैदा करना आसान है। नहीं किया तो अनर्थ होगा!लेकिन भारतीय संस्कृति का सुंदर रास्ता इससे कहीं ऊँचा है
करो, क्योंकि तुम कृतज्ञ हो।
श्राद्ध भय से नहीं,
श्रद्धा से होना चाहिए।
तर्पण डर से नहीं,
कृतज्ञता से होना चाहिए।
दान लालच से नहीं,
करुणा से होना चाहिए।
और पितृ-स्मरण किसी एक पखवाड़े तक सीमित नहीं
- जिस दिन हम अपने माता-पिता और पूर्वजों के अच्छे संस्कार अपने आचरण में उतार लेते हैं, उसी दिन पितरों के प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि पूरी होती है
- हमारे पूर्वज चले गए—लेकिन क्या उनकी कहानी भी हमारे साथ समाप्त हो जानी चाहिए?
नहीं।
- उनकी मेहनत हमारे शरीर में है,
उनकी सीख हमारे संस्कार में है,
उनकी गलतियों से मिली शिक्षा हमारे विवेक में है,
और उनका प्रेम हमारी स्मृतियों में। इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में कम-से-कम इतना जरूर कीजिए—
पितरों का नाम लीजिए,
दो बूँद जल अर्पित कीजिए,
किसी जरूरतमंद को भोजन कराइए,
और मन ही मन कहिए—
- आप जहाँ भी हों, हमारे प्रति आपका ऋण हम स्वीकार करते हैं। हम आपके अच्छे कर्मों को आगे बढ़ाएँगे और आपकी गलतियों को दोहराएँगे नहीं।
यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।”
श्रद्धया दीयते इति श्राद्धम्
जिसमें श्रद्धा हो, वही श्राद्ध है।
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