श्रीयंत्र कितना चमत्कारी है
संसार के समस्त शास्त्र, साधु, संत भी मानते हैं कि यन्त्र या श्रीयंत्र हर समस्या का समाधान है !
- amrutam अमृतम तंत्र, मन्त्र, यन्त्र दीपावली विशेषांक से साभार
- कैसी भी तंगी, गरीबी हो, रोग बीमारी से पीड़ित हों, तो श्रीयंत्र से अच्छा समाधान दुनिया में दूसरा नहीं हैं।
- छोटी मोटी तकलीफों के लिए तंत्र शास्त्रों में 200 से अधिक सिद्ध यंत्रों जा उल्लेख मिलता है।
- तांत्रिक लोग श्रीयंत्र की विशेष विधि से पूजा कर इसे सिद्ध कर लेते हैं और सिद्धि, समृद्धि के स्वामी हो जाते हैं।
- श्रीयंत्र को सभी यंत्रों का राजा बताया है। यंत्रों के माहात्म्य का वर्णन अनेक शास्त्रों, पुराणों व स्मृतियों में किया गया है।
- भुवनेश्वरी क्रम चंडिका में लिखा है, भगवान शिव अपनी शक्ति पत्नी श्री महालक्ष्मी को कह रहे हैं, "हे प्रिये! जैसे प्राणी के लिए शरीर आवश्यक है और दीपक के लिए तेल आवश्यक है ठीक उसी प्रकार देवताओं के लिए यंत्र आवश्यक है।
- मूर्ति स्वरूप होते हैं यन्त्र
- अघोरी अवधूत अपने पास केवल यन्त्र रखते हैं और तपस्या की सारी एनर्जी उसमें समाहित कर यन्त्र को सिद्ध कर लेते हैं। अघोरियों का अपने इष्ट का इसी में वास होता है।
- अवधूत संत मानते हैं कि साधना, उपासना के क्षेत्र में जप के लिए जैसे मंत्रों की अनिवार्य उपयोगिता होती है ठीक वैसे हो यंत्र पूजा के लिए आवश्यक है।
- सभी यंत्र भी अलग अलग इष्ट देव की प्रतीकात्मक मूर्ति स्वरूप होते हैं।
- शास्त्रकारों का तो यहां तक मानना है कि यंत्रों की उपासना से ही मंत्र जप परिपूर्णता को प्राप्त होता है।
- रेखाओं और बिंदुओं के समन्वित रूप से ही सृष्टि की उत्पत्ति-विस्तार हुआ है।
- भारतीय दर्शन में यन्त्र के बिंदु को सृष्टि विस्तार का आधार मानते हुए इसे ही पूर्ण की संज्ञा दी गयी है। वस्तुतः बिंदु ही पूर्ण है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
- यन्त्र के अंदर स्थित बिंदु पूर्णता का आधारभूत प्रतीक है और इस प्रतीक से प्रकृति की रचना हुई है।
- तन्त्र यन्त्र ग्रन्थों में यह समस्त प्रकृति यंत्र रूप ही है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया के रूप में इसी मूल बिंदु से एक त्रिकोण की रचना हुई है और इस त्रिकोण की उत्पत्ति के बाद जगत के रेखात्मक प्रपंच को विस्तार हुआ।
- यंत्र स्वर्ण, रजत (चांदी), पंचलौह, फटिक, ताम्र पर बनाये जाते हैं । यंत्रों की प्राण प्रतिष्ठा का विशेष महत्त्व है।
- श्रीयंत्र की खासियत
- श्री यंत्र शिव दंपत्ति का पूर्ण विग्रह है। श्री विद्या के जो मंत्र हैं वे कुछ शिव के और कुछ शक्ति के कुछ शिव और शक्ति के एक साथ ही हैं।
- श्री यंत्र में कुल नव (९) त्रिकोण होते हैं -चार कोण ऊपर और पांच का नीचे की ओर होता है।
- सारे त्रिकोणों का निर्माण बीच के केंद्र बिंदु को मानकर होता है। बिंदु और त्रिकोण के परस्पर संयोग से श्री यंत्र उद्भूत हुआ है।
- श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी ललिता, महात्रिपुर सुंदरी हैं। इसके अंदर के चक्र 'सर्व आनंदमय' नामक बिंदु से विकसित हुए हैं। इसके बीच में शिव और शक्ति स्थित हैं।
- श्रीयंत्र के नौ त्रिकोणों से ४३ त्रिकोण वाला अष्टदल, षोडष दल वुत्तत्रय एवं भूपुर के साथ ही श्री चक्र का निर्माण होता है।
- कबीरदास जी ने भी श्रीमहालक्ष्मी उपासना की पुष्टि की है
अष्ट कमल दल चरखा डोलै।
श्री यंत्र स्थापना विधि
तन्त्रशास्त्र के अनुसार विधिवत में श्रीयंत्र का पूजन मन्त्र सहित करना जरूरी है। श्रीयंत्र का बीज मन्त्र है।
।।ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे।।
- उपरोक्त नवाक्षर मन्त्र की 9 माला 9 दीपक जलाकर दीपावली की रात्रि में करने के बाद 5 माला एकादश मन्त्र
- ।।ॐ शम्भूतेजसे नमः शिवाय।। अवश्य करें।
- फिर यह यंत्र पूजन के साथ साथ ताबीज बनाकर धारण करने के लिए होता है।
- श्रीयंत्र प्राण प्रतिष्ठित पूजित कराने के पश्चात ही धारण किया जाता है । इस यंत्र से श्री वृद्धि श्री महालक्ष्मी की अपार कृपा होती है।
- यंत्रराज ग्रन्थ के मुताबिक श्री यंत्र के दर्शन से अनेक यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
- इस चित्र में मूल श्रीयंत्र दिया जा रहा है। इसे ही श्रीविद्या, श्रीयंत्र, श्रीमहालक्ष्मी यन्त्र बताया है।
- ध्यान रखें श्रीयंत्र को हमेशा चांदी या स्वर्ण धातु में ही मढ़वाएँ।
- अगर अमृतम पत्रिका का ये पुराना अंक कहीं मिल जाये, तो एक बार जरूर पढ़ें।
Comments
Post a Comment