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शनि महादशा  19 वर्षों का कर्म परीक्षण है। 

शनिदेव करते हैं अहंकार का क्षय और जीवन में लाते हैं एकांत व मानसिक शांति 

  • जवान और ख़ूबसूरती के अहंकार में तनी तनी घूम रही जनी यानी महिलाओं को शनि भारी कष्ट देते हैं।
  • धनी पुरुष पहले से ही शनि से भयभीत रहते हैं। बच्चों का शनि कभी अनिष्ट नहीं करता। ख़ास और दुर्लभ बात यह है कि जिनके माता पिता जीवित हैं शनि उन्हें कभी हानि पहुँचाते ।
  • सबसे फ़नी बात ये है कि शनि की जिससे बनी वह घनी आबादी छोड़कर एकान्त में रहना पसंद करता है।
* स्कंध पुराण अनुसार शनि की शांति और दिव्य कृपा पाने के लिए Honey यानि शहद राहुकाल में शिवलिंग पर अर्पित करने से अनिष्ट नहीं होता। 
  • वैदिक ज्योतिष में शनि महादशा को जीवन का सबसे कठोर लेकिन सबसे न्यायप्रिय काल माना गया है। यह अवधि मनुष्य को भीतर से बदल देती है।
    • शनि धीरे चलते हैं, इसलिए उनकी महादशा भी लंबी होती है और इस दौरान व्यक्ति के धैर्य, कर्म, संबंध, अहंकार, प्रतिष्ठा और सहनशक्ति की परीक्षा होती है।

शनि क्यों करवाते हैं परीक्षा?

शास्त्रों में शनि को कर्मफलदाता कहा गया है।
वे दंड नहीं देते, बल्कि कर्मों का हिसाब करवाते हैं।

शनैः शनैः फलदाता च!

अर्थात शनि धीरे-धीरे कर्मों का फल देते हैं।

  • 19 = 12 + 7- ज्योतिषीय रहस्य यह माना जाता है कि 12 भाव भौतिक जीवन और 7 आध्यात्मिक परिपक्वता का संकेत हैं, १२ साल तक कुंभाभिषेक होता है और ७ साल इंसान के सुर बदलने में लगते हैं, ताकि असुर प्रवृत्ति का नाश हो जाए। इसलिए 19 वर्ष की शनि महादशा व्यक्ति को संसार और आत्मा दोनों का अनुभव कराती है।
शनैः शनैः समायाति शनिर्नाम ग्रहाधिपः। अर्थात शनि धीरे-धीरे जीवन में प्रवेश कर मनुष्य के कर्मों का लेखा खोलते हैं। शनि का अर्थ ही है -शनैः शनैः!! संस्कृत में शनैः का अर्थ होता है -धीरे-धीरे।इसीलिए शनि धीरे चलते हैं। देर से फल देते हैं, लेकिन स्थायी परिणाम देते हैं। 

क्या शनि बच्चों को कष्ट देते हैं?

  • ज्योतिष में एक मान्यता है कि छोटे बच्चों पर शनि का दुष्प्रभाव उतना तीव्र नहीं माना जाता क्योंकि उनका कर्म-संचय सीमित होता है। इसलिए शनि अधिकतर परिपक्व अवस्था में कर्मफल सक्रिय करते हैं।

शनि महादशा की सच्चाई

  • शनि छीनते कम हैं, सिखाते अधिक हैं।
    जो व्यक्ति अनुशासन, सेवा, संयम, श्रम और सत्य का मार्ग पकड़ लेता है, उसके लिए यही 19 वर्ष जीवन का सबसे महान निर्माणकाल बन जाते हैं। शनि देर से देते हैं, पर स्थायी देते हैं।

माता-पिता और शनि का गूढ़ संबंध

  • लोकमान्यता और कई परंपरागत ज्योतिष मतों में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है, शनि उसका भारी अनिष्ट नहीं करते।
  • विशेषकर पिता को शनि और माता को चंद्र का कारक माना गया है। माता-पिता का सम्मान शनि दोष को काफी हद तक शांत करता है।

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।

  • स्कंद पुराण में शिवोपासना को शनि शांति का श्रेष्ठ मार्ग बताया गया है। राहुकाल में शिवलिंग पर शहद अर्पित करना कई परंपराओं में शुभ माना गया है।

शनि महादशा में क्या-क्या होता है?

  • अहंकार का टूटना-युवावस्था, सौंदर्य, धन, पद या संबंधों का अहंकार हो तो शनि उसे धीरे-धीरे तोड़ते हैं। कई लोग इस काल में अपमान, दूरी, असफल प्रेम या सामाजिक उपेक्षा का अनुभव करते हैं ताकि भीतर विनम्रता जागृत हो। विशेषतः जो व्यक्ति बाहरी आकर्षण और दिखावे में अधिक डूबा रहता है, शनि उसे वास्तविकता का दर्पण दिखाते हैं।
  • धैर्य की परीक्षा-शनि तुरंत फल नहीं देते।
    वे प्रतीक्षा करवाते हैं, संघर्ष करवाते हैं और व्यक्ति को मेहनत का वास्तविक अर्थ समझाते हैं।

धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
धैर्य ही हर सिद्धि का आधार है।

  • एकांत प्रिय बना देते हैं- यह एक दुर्लभ अनुभव है कि जिनकी शनि से बनी होती है, वे भीड़, शोर और दिखावे से दूर होकर एकांत, मौन और सीमित लोगों में रहना पसंद करने लगते हैं।संघर्ष करवाते हैं और व्यक्ति को मेहनत का वास्तविक अर्थ समझाते हैं।

सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः॥

  • शनि मंद गति वाले हैं, परंतु शिवप्रिय और अंततः पीड़ा हरने वाले भी हैं। शनि पहले अहंकार तोड़ते हैं, फिर वास्तविक शक्ति देते हैं।

शनि और एकांत का दुर्लभ रहस्य

  • पुराने तांत्रिक मतों में कहा गया है कि शनि की कृपा होने पर व्यक्ति भीड़ से दूर रहने लगता है।कम बोलता है। रात, मौन और एकांत पसंद करता है। दिखावे से विरक्त हो जाता है। इसीलिए अनेक साधु, योगी और तपस्वियों की कुंडली में शनि प्रबल पाए जाते हैं।

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